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Sunday, June 13, 2021
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अवधि भाषाको कविता …

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दुखहरण यादव
(विक्रम अनोखी)

हे प्रिया ! तु हमार गटई काट लिहेओ
कौनो धर्मग्रन्थमा लिखा तो नाय,
लकिन सच होय
प्यार जेतना बार किया जाय
द्धितीयक उजेर प्रेमीनकय मुंह टेंढ कई देत हय
यि दर्शन हमेशा वेवकुफी पय खतम होत हय
कि आप पाव भर हरेर साग खरिदा जात हय
औ सोचा जात हय
सब दुनिया हरेर हय
चार किताब पढकय,
दिमाग भर लेवा जात हय
औ वुद्धिजिवी मा गिनती करुवावा जात हय ।
आपका अगुवारे पिछुवारे देखयक फुर्सत नाय हय
औ यि व्यस्तता कोहीकय गल्ती न होय
यि चालबाजेनकय दुनिया होय
आप जवन दुनिया सोचा जात हय
अपने प्रेमीकय साथ,
आज तिसरा आशिक साथे आवा हय
एक बात वतावै,
कि उनकय दुनिया उजाड हय
औ वयंअकेल हंय
लकिन आप हाल चाल नाय
गटईक माल, कानेक बाला पुंछा गवा
आप धन, सम्पत्ति औ जात पुंछा गवा
घोडा, गाडी कय मोल करा जात हय
औ जिन्दगी का मधुमास बनावा गा हय ।
वास्तवमा हमरे दर्दकय शिविरमा जावा जात हय
जहां नियतमा कि मौत लिखा हय
या तो थुक चाटयवाला जिन्दगी
जब मौत आई तब
सबसे सुरक्षित बौराहा औ दुखी होईहंय
अगर दुसर हम्मय छुवयक चाहिस् तो
हे प्रिया तु हमार गटई काट लिहेओ ।
लाल होई तो खुनसे हमरे माग भर लिहेओ ।।
गढवा, दाङ

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